ज्ञानी गड़गज्ज ने कहा कि 1990 के दशक में मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा ने कथित फर्जी पुलिस मुठभेड़ों और न्यायेतर हत्याओं से जुड़े मामलों की जानकारी एकत्र कर उन्हें सार्वजनिक किया था। उनका दावा था कि इन मामलों में बड़ी संख्या में लोगों के रिकॉर्ड जुटाकर उन्होंने मानवाधिकार उल्लंघनों की ओर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि खालड़ा का जीवन अन्याय के खिलाफ संघर्ष और सच को सामने लाने का प्रतीक माना जाता है। ऐसे विषय पर बनी फिल्म को रोकने के बजाय लोगों को उसे देखने और अपनी राय बनाने का अवसर दिया जाना चाहिए। उनका कहना था कि इतिहास और मानवाधिकार से जुड़े मुद्दों पर चर्चा को सीमित करना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के हित में नहीं है। जत्थेदार ने यह भी कहा कि यदि विभिन्न समुदायों के इतिहास और उनके साथ हुई घटनाओं पर आधारित फिल्मों का प्रदर्शन किया जा सकता है, तो सिख समुदाय से जुड़े विषयों पर बनी फिल्म को भी समान अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने इसे समानता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विषय बताया।
उन्होंने केंद्र सरकार से अपील की कि वह इस मामले में सकारात्मक रुख अपनाए और फिल्म ‘सतलुज’ के प्रदर्शन की अनुमति सुनिश्चित करे, ताकि लोग जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और उनसे जुड़े घटनाक्रम को समझ सकें। ज्ञानी गड़गज्ज ने कहा कि सच को लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता और इतिहास से जुड़े मुद्दों पर पारदर्शिता जरूरी है। उन्होंने जून 1984 के बाद सिख समुदाय से जुड़े कथित फर्जी मुठभेड़ों और अन्य मामलों की निष्पक्ष जांच तथा पीड़ितों को न्याय दिलाने की भी मांग दोहराई। उन्होंने कहा कि फिल्म को ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के फैसले से सिख समुदाय की भावनाएं आहत हुई हैं। उनका मानना है कि लोकतांत्रिक समाज में हर समुदाय की पीड़ा और इतिहास को समान रूप से सामने आने का अवसर मिलना चाहिए।