नेपाल में आई भीषण बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है। कई पूरे गांव उजड़ गए हैं और बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए हैं। बाढ़ के तेज बहाव में सड़कें और पुल बह गए, जबकि बिजली की लाइनें और नदी के जलस्तर पर नजर रखने वाले गेज भी क्षतिग्रस्त हो गए। आपदा के कारण गुरुवार तक 1,250 से ज्यादा लोगों की मौत की जानकारी सामने आई है। वहीं, 4,800 से अधिक लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। दुर्गम इलाकों में फंसे लोगों तक राहत और बचाव दलों का पहुंचना बड़ी चुनौती बना हुआ है। कई हाइड्रोपावर सुरंगों में सैकड़ों मजदूरों के फंसे होने की जानकारी भी सामने आई है। बाढ़ के बाद चुनौती केवल लोगों को सुरक्षित निकालने तक सीमित नहीं है। हजारों परिवारों के सामने अब घर, रोजगार और सामान्य जिंदगी दोबारा शुरू करने की मुश्किल खड़ी हो गई है। जहां सड़कें और पुल बह गए हैं, वहां राहत सामग्री पहुंचाना भी बेहद कठिन हो गया है। कई परिवारों ने अपने घर खो दिए हैं, जबकि कुछ लोग अब भी अपने लापता परिजनों की जानकारी का इंतजार कर रहे हैं। घायलों को अस्पताल पहुंचाने, मृतकों की पहचान करने और प्रभावित परिवारों तक जरूरी सामान पहुंचाने के लिए स्थानीय स्तर पर लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इस मुश्किल समय में नेपाल के स्थानीय समुदायों ने मदद की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली है। जिन लोगों के घर सुरक्षित हैं या जिनके पास संचार की सुविधा उपलब्ध है, वे दूसरे प्रभावित परिवारों की मदद कर रहे हैं।
कई इलाकों में स्थानीय लोगों ने प्रशासन और राहत एजेंसियों के पहुंचने से पहले ही बचाव और राहत का काम शुरू कर दिया। लोगों ने एक-दूसरे को बाढ़ के खतरे की जानकारी दी और सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने में मदद की। नेपाल में सामने आई कई घटनाएं बताती हैं कि आपदा के समय स्थानीय नेटवर्क कितना महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। एक शिक्षक ने बाढ़ की चेतावनी के बाद सैकड़ों बच्चों की जान बचाने में मदद की। ऊपरी इलाकों में रहने वाले लोगों ने भी निचले क्षेत्रों में बसे गांवों तक समय रहते बाढ़ की सूचना पहुंचाई। इस तरह स्थानीय स्तर पर मौजूद संपर्क और सामुदायिक व्यवस्था कई लोगों के लिए जीवनरक्षक साबित हुई। नेपाल में ‘गुठी’ जैसी पारंपरिक सामुदायिक व्यवस्थाएं पहले से लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने का काम करती हैं। आपदा के समय यही नेटवर्क तेजी से सक्रिय होकर जरूरतमंद लोगों तक मदद पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। स्थानीय लोगों को यह भी पता होता है कि किस घर में बुजुर्ग अकेले रहते हैं, कौन सा परिवार ज्यादा असुरक्षित है और किन इलाकों में पर्यटक या यात्री फंसे हो सकते हैं। बाढ़ के कारण जब सड़क और संचार व्यवस्था ने काम करना बंद किया, तब स्थानीय लोगों ने अपने स्तर पर रास्ते तलाशे। कहीं मरीजों को क्षतिग्रस्त सड़कों के पार पहुंचाया गया, तो कहीं लोगों ने दूसरे गांवों तक संदेश पहुंचाने की जिम्मेदारी संभाली।
स्कूलों, मठों और कई निजी घरों को अस्थायी राहत केंद्रों में बदला गया। स्थानीय परिवहन से जुड़े लोगों ने भी अपनी सेवाओं का इस्तेमाल पानी, भोजन, कपड़े और दूसरी जरूरी चीजें प्रभावित इलाकों तक पहुंचाने में किया। कुछ रेस्तरां और स्थानीय कारोबारी भी जरूरतमंद परिवारों के लिए गर्म भोजन उपलब्ध कराने में जुट गए। इससे साफ है कि आपदा के दौरान सरकारी मदद के साथ स्थानीय समुदायों की भूमिका कितनी अहम हो जाती है। आपदा के तुरंत बाद राहत और बचाव पर पूरा ध्यान रहता है। सरकार, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं और सामाजिक संगठन सहायता पहुंचाते हैं, लेकिन कुछ समय बाद जब लोगों का ध्यान दूसरी घटनाओं की ओर चला जाता है, तब प्रभावित परिवारों की असली परीक्षा शुरू होती है। राहत के बाद घर बनाना, कारोबार दोबारा शुरू करना, बच्चों की पढ़ाई बहाल करना और सामाजिक जीवन को पटरी पर लाना लंबी प्रक्रिया होती है। इस दौरान स्थानीय समुदाय लगातार प्रभावित परिवारों के साथ बने रहते हैं।
नेपाल की पारंपरिक ‘परमा’ व्यवस्था भी ऐसे समय में मददगार साबित हो रही है। इसमें एक परिवार दूसरे परिवार के काम में सहयोग करता है और जरूरत पड़ने पर दूसरा परिवार भी उसकी मदद करता है। बाढ़ के बाद इस व्यवस्था का इस्तेमाल मलबा हटाने, बची हुई चीजों को सुरक्षित निकालने और अस्थायी घर तैयार करने जैसे कामों में किया जा रहा है। बाहरी एजेंसियां जहां औजार और जरूरी सामान उपलब्ध करा रही हैं, वहीं स्थानीय लोग अपनी मेहनत और इलाके की जानकारी दे रहे हैं। इस आपदा के बीच नेपाल के बच्चों ने भी इंसानियत की मिसाल पेश की है। कई स्कूलों के छात्रों ने अपने जेब खर्च और स्नैक्स के लिए रखे पैसे तक बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए दान कर दिए। अछाम के शोडश माध्यमिक विद्यालय में नौवीं कक्षा के छात्र यूनिक केसी ने बाढ़ प्रभावित बच्चों के लिए चंदा जुटाने का सुझाव दिया। इसके बाद स्कूल के चाइल्ड क्लब से जुड़े छात्रों ने अलग-अलग कक्षाओं में जाकर स्वैच्छिक योगदान जुटाया। बच्चों ने पांच नेपाली रुपये से लेकर 500 नेपाली रुपये तक का योगदान दिया। कुछ छात्रों ने वह रकम भी दान की, जिसे वे आमतौर पर स्नैक्स खरीदने में खर्च करते थे।
इस अभियान के पहले दिन 8,785 नेपाली रुपये जमा हुए। दूसरे दिन 5,470 रुपये और मिले। इस तरह कुल 14,255 नेपाली रुपये एकत्र किए गए। यह रकम बुधवार को राष्ट्रीय वाणिज्यिक बैंक के माध्यम से प्रधानमंत्री राहत कोष में जमा कराई गई। खास बात यह रही कि जिन सात बच्चों ने अपने माता-पिता खो दिए थे, उन्होंने भी राहत राशि में योगदान दिया। अन्य स्कूलों के छात्रों ने भी इसी तरह मदद का हाथ बढ़ाया। मंगलेसेन के प्रगतिशील बेसिक स्कूल में बच्चों ने एक दिन के स्नैक्स का पैसा राहत के लिए दिया और 585 नेपाली रुपये जमा किए। कपिलवस्तु में पांचवीं कक्षा की नौ वर्षीय सोम्या उपाध्याय ने अपने माता-पिता से स्नैक्स के लिए सामान्य से 20 रुपये अधिक मांगे और बाद में 50 रुपये राहत के लिए दान कर दिए।
इसी स्कूल की सात वर्षीय राधिका कोहार ने भी 30 रुपये दान किए। दोनों बच्चियों ने उस दिन स्नैक्स नहीं खाए। उनके इस कदम से प्रेरित होकर दूसरे छात्रों ने भी पांच से 100 रुपये तक का योगदान दिया। स्कूल में कुल 10,050 नेपाली रुपये जमा हुए, जिन्हें प्रधानमंत्री प्राकृतिक आपदा राहत कोष में जमा कराया गया। स्कूल के प्रधानाध्यापक के मुताबिक, 350 छात्रों में से 200 से ज्यादा बच्चों ने इस अभियान में योगदान दिया। बच्चों ने खुद चंदा बॉक्स तैयार किया और अलग-अलग कक्षाओं में जाकर अपने साथियों से राहत के लिए मदद मांगी। रौतहट के प्रेमपुर गोनाही माध्यमिक विद्यालय के 26 छात्रों ने भी अपने स्नैक्स के पैसे से 470 नेपाली रुपये जुटाए। काठमांडो के मनमैजू माध्यमिक विद्यालय में कक्षा 11 और 12 के छात्रों ने राहत अभियान की अगुवाई की। कक्षा छह से 12 तक के विद्यार्थियों ने अपने स्नैक्स का खर्च कम करके पैसे जुटाए। इस अभियान से कुल 37,110 नेपाली रुपये जमा हुए। यह राशि भी प्रधानमंत्री राहत कोष में जमा कराई गई।
रौतहट के शिक्षक मुकेश यादव ने बच्चों की इस पहल को मानवीय संवेदना की मिसाल बताया। उन्होंने कहा कि भूगोल लोगों को अलग कर सकता है, लेकिन दुख साझा होता है। अछाम के शिक्षक धन कुमार केसी ने भी छात्रों की पहल की सराहना की। उनके मुताबिक, योगदान छोटा या बड़ा नहीं होता, बल्कि संकट के समय मदद के लिए आगे आना सबसे महत्वपूर्ण है। बुधवार दोपहर तक प्रधानमंत्री राहत कोष में 7.77 अरब नेपाली रुपये जमा होने की जानकारी दी गई थी। इसके अलावा सरकार के डॉलर खाते में करीब छह मिलियन अमेरिकी डॉलर भी जमा किए गए थे। बाढ़ ने रासुवा, नुवाकोट और धादिंग समेत कई क्षेत्रों को प्रभावित किया है। कई स्कूलों में मिट्टी, रेत और गाद भर गई है, जिससे शिक्षा व्यवस्था भी प्रभावित हुई है। बताया गया है कि 26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा के पास बर्फ और चट्टानों के हिमस्खलन के बाद बाढ़ की स्थिति बनी। इसके बाद उत्तरी और मध्य नेपाल के कई कस्बों और गांवों में भारी तबाही हुई। अब बचाव और राहत अभियान के साथ पुनर्वास और पुनर्निर्माण की बड़ी चुनौती सामने है। प्रभावित इलाकों में सड़कों, पुलों, बिजली व्यवस्था, घरों और स्कूलों को दोबारा खड़ा करने में लंबा समय लग सकता है।
सरकार और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की मदद इस पूरी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण होगी। हालांकि जमीन पर सबसे पहले और लंबे समय तक स्थानीय लोग ही एक-दूसरे का सहारा बनेंगे। नेपाल की इन घटनाओं ने यह भी दिखाया है कि बड़ी आपदा के समय मदद हमेशा बड़े संसाधनों से ही नहीं आती। किसी के पास लाखों रुपये हैं, तो कोई अपने हिस्से का सिर्फ एक स्नैक छोड़कर मदद कर रहा है। ऐसी छोटी-छोटी कोशिशें ही प्रभावित परिवारों को यह भरोसा देती हैं कि मुश्किल समय में वे अकेले नहीं हैं।