देहरादून:- उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव की सियासी बिसात धीरे-धीरे तैयार होने लगी है। चुनाव में अभी वक्त है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपने-अपने सामाजिक और राजनीतिक समीकरण साधने शुरू कर दिए हैं। इसी बीच बीजेपी ने संत रविदास की 650वीं जयंती को केंद्र में रखकर ‘समरसता संकल्प अभियान’ शुरू किया है। बीजेपी इस अभियान को संत गुरु रविदास के समता, सामाजिक न्याय, बंधुत्व, सेवा और सामाजिक समरसता के विचारों को समाज के हर वर्ग तक पहुंचाने की पहल बता रही है। वहीं विपक्ष इसे आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए दलित समाज के बीच अपनी राजनीतिक पहुंच मजबूत करने की कोशिश करार दे रहा है।
उत्तराखंड में दलित आबादी करीब 17 फीसदी बताई जाती है। ऐसे में 2027 के चुनाव से पहले इस बड़े सामाजिक वर्ग तक पहुंच बनाने की कोशिश को राजनीतिक नजरिए से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब सवाल यही है कि क्या बीजेपी का यह अभियान उसे चुनावी फायदा दिला पाएगा या फिर उत्तराखंड का मतदाता रोजगार, महंगाई, विकास और स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता देगा?
चुनाव से पहले बीजेपी की बड़ी सामाजिक पहल
संत रविदास की 650वीं जयंती के अवसर पर बीजेपी ने देशभर में ‘समरसता संकल्प अभियान’ शुरू किया है। पार्टी का कहना है कि अभियान का मकसद संत रविदास के सामाजिक समानता और भाईचारे के संदेश को जन-जन तक पहुंचाना है। बीजेपी इस पहल को सिर्फ राजनीतिक अभियान के तौर पर नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता और सभी वर्गों की भागीदारी से जोड़कर पेश कर रही है। पार्टी का दावा है कि संत रविदास के विचारों को आगे बढ़ाते हुए समाज में समानता और समरसता का संदेश मजबूत किया जाएगा। लेकिन चुनावी साल के करीब शुरू हुए इस अभियान ने उत्तराखंड की राजनीति में इसके राजनीतिक मायने को लेकर बहस भी तेज कर दी है।
उत्तराखंड में 107 रविदास मंदिरों पर फोकस
बीजेपी की रणनीति में उत्तराखंड के 107 रविदास मंदिरों को अहम केंद्र माना जा रहा है। अभियान के दौरान इन मंदिरों के माध्यम से सामाजिक संवाद और जनसंपर्क बढ़ाने की तैयारी है। वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर को संत रविदास की जन्मस्थली माना जाता है। अभियान के तहत वहां से पवित्र मिट्टी के कलश विभिन्न राज्यों तक पहुंचाने की योजना है। इसके बाद कलश यात्राएं, सामाजिक संवाद, संगोष्ठियां और अन्य कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। खास बात यह है कि इस अभियान को केवल बड़े आयोजनों तक सीमित रखने के बजाय इसे बूथ स्तर तक ले जाने की रणनीति पर जोर दिया जा रहा है। यही पहल इसे चुनावी राजनीति के लिहाज से ज्यादा महत्वपूर्ण बना रही है।
कब तक चलेगा समरसता संकल्प अभियान?
बीजेपी का यह अभियान 29 जुलाई 2026 से शुरू होकर 20 फरवरी 2027 तक चलने की बात कही गई है। यानी यह अभियान उत्तराखंड विधानसभा चुनाव से पहले लंबे समय तक राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों का हिस्सा बना रह सकता है। ऐसे में बीजेपी के लिए यह सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं बल्कि चुनाव से पहले जमीनी स्तर पर संगठन और सामाजिक संपर्क बढ़ाने का माध्यम भी बन सकता है।
कांग्रेस ने बताया चुनावी स्टंट
बीजेपी के अभियान पर कांग्रेस ने सवाल खड़े किए हैं। कांग्रेस का आरोप है कि ‘समरसता संकल्प अभियान’ का असली मकसद दलित समाज के बीच राजनीतिक प्रभाव बढ़ाना है। कांग्रेस प्रदेश प्रवक्ता प्रतिमा सिंह ने इसे चुनावी स्टंट बताया है। उनका सवाल है कि जिन मुद्दों पर बीजेपी पर संविधान और बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों को लेकर विपक्ष सवाल उठाता रहा है, वही पार्टी अब सामाजिक समरसता की बात कर रही है। हालांकि कांग्रेस के इन आरोपों को राजनीतिक बयान के तौर पर देखा जाना चाहिए। अभियान को लेकर बीजेपी का अपना तर्क है और पार्टी इसे सामाजिक समरसता तथा संत रविदास के विचारों के प्रचार-प्रसार से जोड़कर देख रही है।
क्या बीजेपी की नजर 17 फीसदी दलित वोटबैंक पर है?
यही सवाल इस पूरे अभियान की राजनीतिक चर्चा के केंद्र में है। उत्तराखंड की राजनीति में दलित मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण है। ऐसे में चुनाव से कुछ महीने पहले संत रविदास के नाम पर शुरू हुआ व्यापक अभियान बीजेपी के लिए इस वर्ग के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने का अवसर हो सकता है। लेकिन केवल किसी एक सामाजिक वर्ग को साधने से चुनावी जीत सुनिश्चित नहीं होती। उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय मुद्दे, स्थानीय उम्मीदवार, संगठन, जातीय-सामाजिक समीकरण और सरकार के कामकाज जैसे कई कारक चुनावी परिणाम को प्रभावित करते हैं। यही वजह है कि बीजेपी की इस रणनीति को फिलहाल एक संभावित राजनीतिक विस्तार की कोशिश के तौर पर देखना ज्यादा उचित होगा, न कि चुनावी परिणाम का संकेत।
हरिद्वार का सियासी गणित क्यों अहम?
दलित राजनीति की चर्चा में हरिद्वार का महत्व और बढ़ जाता है। 2022 के विधानसभा चुनाव में हरिद्वार जिले की 11 सीटों में बीजेपी को हरिद्वार, रुड़की और बीएचईएल रानीपुर सीटों पर जीत मिली थी। बाकी सीटों पर कांग्रेस, बसपा और निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी। इस लिहाज से हरिद्वार आने वाले विधानसभा चुनाव में बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र बना रहेगा। यहां सामाजिक समीकरणों के साथ-साथ स्थानीय मुद्दे और उम्मीदवारों की भूमिका भी काफी अहम हो सकती है। ऐसे में रविदास मंदिरों और सामाजिक कार्यक्रमों के जरिए जमीनी संपर्क बढ़ाने की रणनीति बीजेपी के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है।
उत्तराखंड का दलित समाज सिर्फ चुनावी आंकड़ा नहीं
राजनीतिक विश्लेषकों का एक अहम तर्क यह है कि उत्तराखंड में दलित राजनीति को सिर्फ वोट प्रतिशत के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। राज्य का अपना सामाजिक इतिहास रहा है। जयानंद भारती, हरि प्रसाद टम्टा और खुशी राम आर्य जैसे नेताओं और समाज सुधारकों का दलित समाज के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इस वजह से उत्तराखंड का दलित राजनीतिक व्यवहार उत्तर प्रदेश की राजनीति से पूरी तरह समान नहीं माना जा सकता। यहां स्थानीय नेतृत्व, क्षेत्रीय पहचान और सामाजिक इतिहास भी मतदाताओं के राजनीतिक रुझान को प्रभावित करते हैं। यही कारण है कि उत्तराखंड में किसी भी दल के लिए दलित वोट को एक समान राजनीतिक ब्लॉक मानना आसान नहीं होगा।
बीजेपी के सामने चुनौती सिर्फ दलित वोट की नहीं
बीजेपी जहां ‘समरसता’ के जरिए अपने सामाजिक आधार का विस्तार करने की कोशिश कर रही है, वहीं कांग्रेस, बसपा और भीम आर्मी जैसे राजनीतिक दल भी अपने-अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने की चुनौती का सामना कर रहे हैं। बसपा के लिए दलित वोट उसका पारंपरिक राजनीतिक आधार रहा है, जबकि भीम आर्मी से जुड़े राजनीतिक प्रयास भी इस वर्ग में अपनी जगह बनाने की कोशिश करते रहे हैं। कांग्रेस भी बीजेपी के अभियान को लेकर सवाल उठाकर अपने सामाजिक और राजनीतिक समर्थन को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में 2027 से पहले उत्तराखंड में दलित राजनीति का मुकाबला सिर्फ बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीमित नहीं रह सकता।
क्या सामाजिक अभियान बदल सकता है चुनावी समीकरण?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ‘समरसता संकल्प अभियान’ बीजेपी को 2027 के चुनाव में वास्तविक राजनीतिक लाभ दिला पाएगा? इसका जवाब कई चीजों पर निर्भर करेगा। अभियान सिर्फ बड़े मंचों तक सीमित रहता है या वास्तव में गांव, वार्ड और बूथ स्तर तक पहुंचता है, स्थानीय दलित नेतृत्व को कितना स्थान मिलता है और इन कार्यक्रमों का असर मतदाताओं के बीच कितना दिखाई देता है—ये सभी कारक महत्वपूर्ण होंगे। साथ ही विपक्ष इस रणनीति की काट कैसे तैयार करता है, यह भी चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकता है।
रोजगार, महंगाई और विकास भी रहेंगे बड़े मुद्दे
उत्तराखंड में चुनावी राजनीति केवल सामाजिक समीकरणों के आधार पर तय होगी, ऐसा मानना जल्दबाजी होगी। रोजगार, महंगाई, पलायन, सड़क और स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा, पर्यटन, विकास परियोजनाएं और स्थानीय स्तर की समस्याएं भी मतदाताओं के लिए अहम मुद्दे हो सकते हैं। इसके अलावा पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों की अलग-अलग राजनीतिक प्राथमिकताएं भी चुनावी रणनीति को प्रभावित कर सकती हैं।
इसलिए बीजेपी का ‘समरसता संकल्प अभियान’ कितना असरदार साबित होगा, यह सिर्फ दलित समाज के बीच पहुंच से तय नहीं होगा। असली परीक्षा तब होगी जब सामाजिक अभियान के साथ-साथ स्थानीय मुद्दों और सरकार के प्रदर्शन को लेकर मतदाताओं की प्रतिक्रिया सामने आएगी।
2027 में किसके पक्ष में बनेगा समीकरण?
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 से पहले बीजेपी ने सामाजिक विस्तार की दिशा में अपना एक महत्वपूर्ण अभियान जरूर शुरू कर दिया है। संत रविदास के विचारों को केंद्र में रखकर चलाया जा रहा यह अभियान पार्टी को दलित समाज के बीच अपनी मौजूदगी मजबूत करने का अवसर दे सकता है। लेकिन विपक्ष भी इसे चुनावी रणनीति बताकर बीजेपी पर हमलावर है। ऐसे में आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि अभियान सामाजिक संदेश तक सीमित रहता है या वास्तव में जमीनी राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करता है। उत्तराखंड में 2027 का चुनाव सिर्फ वोट प्रतिशत का खेल नहीं होगा। सामाजिक समीकरण, स्थानीय नेतृत्व, सरकार के कामकाज और जनता के मुद्दे—इन सभी का मिलाजुला असर चुनावी नतीजे तय कर सकता है।